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kaavya manjari

Thursday, July 13, 2017

लेखनी



*******************लेखनी***************
कभी मीरा कभी राधा कभी घनश्याम लिखती हूं
कभी होठों की शबनम कभी तो ज़ाम लिखती हूं
खुद को मिटाके भी सफ़े को रंगीन कर रही मौला
कभी रजनी कभी ऊषा कभी तो शाम लिखती हूं
**********@आनंद*************************


1 comment:

  1. वाह, ये शायरी सच में बहुत खूबसूरत है! हर पंक्ति में अलग ही रंग और एहसास है। मुझे यह बहुत पसंद आया कि कवि खुद को मिटा कर भी सफ़े को रंगीन बना रहा है, जैसे अपनी भावनाओं और प्यार को पूरी दुनिया में बिखेर रहा हो। मीरा, राधा, घनश्याम, रजनी, ऊषा, शाम, हर नाम अपने आप में कहानी है और हर पंक्ति में आत्मा का स्पर्श है।

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