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kaavya manjari

Saturday, October 29, 2016

दीपावली के दीप.......





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चलो......फिर से दिवाली का इक जश्न मनाना है
गिले शिकवे के तिमिर से.....मुक्त मन बनाना है

अमावस की निशा में तो....हर ज्योति निराली है
भव्य दीपामालाओं से अपना गुलशन सजाना है
@आनन्द
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Sunday, March 1, 2015

होली के रंग .............................

होली के रंग में रंगे,   जाने माने रुप।
मिटा द्वेष ऐसे मिले,बरसों बिछड़े भूप।।
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घृणा को तज  के हुये,प्रियवर के स्वरूप।
और मुरझाए खिल उठे,कुसुमकोश पे धूप।।
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बूँदे ढलकी हँसी की,सूखे अधर अकूत
धरणी भी हर्षित हुई,जैसे मिले सपूत।।
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और अबीर गुलाल से,कर गालों को लाल।
थापों ठुमकों से रचे,थिरक उठे नंदलाल।।

Saturday, January 17, 2015

उड़ी पतंग अरमानों की.......................


उड़ी पतंग अरमानों की...... वो नील गगन आनंदित है
उन्मुक्त उमंग तूफ़ानों की. वो वेग पवन आह्लादित है

निर्बोध सही उन बच्चों सा  अंगारों का मर्दन करना है
सखी बनूँ   उड़ानों की वो सुरभित सुमन उल्लासित है 

Friday, November 21, 2014

कोई इस नाचीज़ .................

कोई इस  नाचीज़  को ही चीज़ कह गया
खद्दर के  दुशाले  को कमीज़  कह गया
आज ताज़्ज़ुब हो गया इस कदर आनन्द
इक अजनबी आके हमे  अज़ीज कह गया

Monday, September 15, 2014

इरादों से इरादों.......

इरादों से इरादों का बदलना भी जरूरी है..
साख से बिछड़ों का पुनः मिलना जरूरी है

चंद रेखाओं से कभी तस्वीर नही बनती
लकीरों से लकीरों का मिलना भी जरूरी है

कुछ लोग हैं जो खुद को यूंही भूल बैठे हैं
उनके आईनों से धूल का हटना जरूरी है

Tuesday, July 15, 2014

देखते ही......................

देखते ही देखते कुछ लोग ग़ज़ल हो रहे थे
किसी से गुफ़्तगू के दरमियां वो फ़जल हो रहे थे
हमे तो शौक था उनको झांक कर देखने का
तजुर्बे की सुधा से होंठ उनके सजल हो रहे थे
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गुस्ताखियां मेरी आज किसी के हाथ लग गई
होशियारी की तहों में सिलबटों की बाढ़ लग गई
बड़े जोश में निकला था उनका सामना करने को मैं
शालीनता के तेज से मेरी शैतानियों की तो बाट लग गई
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पाकीजा मुहब्बत की इक किरदार तुम बन जाओ
प्रेम पूज्य गंगा की इक पतवार तुम बन जाओ
पग पग पे भरोसे की.......... नैया जो डूबती है
मझधार में कस्ती की खेवनहार तुम बन जाओ
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हो गई शरारत संभलते संभलते...
खो गया ख्वाब में सोचते सोचते...
इस तरह जमाने से कहना न था..
लफ़्ज जाहिर हुये रोकते रोकते.....
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मेरी उम्मीदों के हर्फ़ो से बनती एक कहानी हो
चंदा के रूह में बसती एक आस पुरानी हो
बरखा की बूँदों से चलती अविरल एक रवानी हो

सुकूं-चैन की चोरी की तुम एक चोर पुरानी हो
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Thursday, May 22, 2014

माँ................................


दिन के ढलते ही माँ की इक फरियाद होती है|
जल्दी घर  आ जा तूँ  तेरी अब याद होती है||

खाने की ताजगी की भी कुछ मियाद होती है|
तेरे बिन छप्पन भोग की हर चीज बेस्वाद होती है||

देखो गाँव से बाबा  न जाने कब से  आए हैं|
माटी में लिपटी अठखेलियों की ही याद होती है||

धीर के रुखसार पे अब बेचैनियों का डेरा है|
मुन्तजिर आँखों में मिलन की मुराद होती है||

दिन के ढलते ही माँ की इक फरियाद होती है|
स्वप्निल इमारत की कुछ तो बुनियाद होती है||

दिन के ढलते ही......................

 मुन्तजिर - इन्तजार