अन्तर्मन में पल्लवित, स्वर्णिम भावनात्मक और वैचारिक उर्मिल उर्मियों की श्रृंखला को काव्य में ढालकर आपके मन मस्तिष्क को आनन्दमयी करने के लिये प्रस्तुत है जानकीनन्दन आनन्द की यह ''आनन्दकृति''
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Saturday, January 17, 2015
Friday, November 21, 2014
कोई इस नाचीज़ .................
Tuesday, July 15, 2014
देखते ही......................
देखते ही देखते कुछ लोग ग़ज़ल हो रहे थे
किसी से गुफ़्तगू के दरमियां वो फ़जल हो रहे थे
हमे तो शौक था उनको झांक कर देखने का
तजुर्बे की सुधा से होंठ उनके सजल हो रहे थे
...................................................................
गुस्ताखियां मेरी आज किसी के हाथ लग गई
होशियारी की तहों में सिलबटों की बाढ़ लग गई
बड़े जोश में निकला था उनका सामना करने को मैं
शालीनता के तेज से मेरी शैतानियों की तो बाट लग गई
.........................................................................
पाकीजा मुहब्बत की इक किरदार तुम बन जाओ
प्रेम पूज्य गंगा की इक पतवार तुम बन जाओ
पग पग पे भरोसे की.......... नैया जो डूबती है
मझधार में कस्ती की खेवनहार तुम बन जाओ
....................................................................
हो गई शरारत संभलते संभलते...
खो गया ख्वाब में सोचते सोचते...
इस तरह जमाने से कहना न था..
लफ़्ज जाहिर हुये रोकते रोकते.....
........................................................
मेरी उम्मीदों के हर्फ़ो से बनती एक कहानी हो
चंदा के रूह में बसती एक आस पुरानी हो
बरखा की बूँदों से चलती अविरल एक रवानी हो
सुकूं-चैन की चोरी की तुम एक चोर पुरानी हो
किसी से गुफ़्तगू के दरमियां वो फ़जल हो रहे थे
हमे तो शौक था उनको झांक कर देखने का
तजुर्बे की सुधा से होंठ उनके सजल हो रहे थे
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गुस्ताखियां मेरी आज किसी के हाथ लग गई
होशियारी की तहों में सिलबटों की बाढ़ लग गई
बड़े जोश में निकला था उनका सामना करने को मैं
शालीनता के तेज से मेरी शैतानियों की तो बाट लग गई
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पाकीजा मुहब्बत की इक किरदार तुम बन जाओ
प्रेम पूज्य गंगा की इक पतवार तुम बन जाओ
पग पग पे भरोसे की.......... नैया जो डूबती है
मझधार में कस्ती की खेवनहार तुम बन जाओ
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हो गई शरारत संभलते संभलते...
खो गया ख्वाब में सोचते सोचते...
इस तरह जमाने से कहना न था..
लफ़्ज जाहिर हुये रोकते रोकते.....
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मेरी उम्मीदों के हर्फ़ो से बनती एक कहानी हो
चंदा के रूह में बसती एक आस पुरानी हो
बरखा की बूँदों से चलती अविरल एक रवानी हो
सुकूं-चैन की चोरी की तुम एक चोर पुरानी हो
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Wednesday, January 8, 2014
वफ़ा के नाम से डरते हैं ..
बेदर्द जमाने में ,खत-ओ-पैगाम से डरते हैं ||1
दीदार में दिये के हम, पतंगा-से जलते हैं |
रातों को आहट में, हम जुगनू-से जलते हैं ||
रजनी के आँचल में, आहें तो भरते हैं |
करवट में उड़ाएं नींद, उन यादों से डरते हैं||
मगरूर हैं अदाओं में, हमें जो इंकार करते हैं|
हरे जख्म करे हर बार, उसी मुस्कान से डरते हैं||
चुपके से आओ यार इल्तिजा तेरे नाम करते हैं|
खामोश फिज़ाओं में अब हम कोहराम से डरते हैं|
''आनन्द'' मिला दिन-रात, जिसे विसाले -नाम करते हैं|
दानिस्ता नैन किए दो चार, मगर अब अन्जाम से डरते हैं||
Sunday, March 10, 2013
पास आओ जरा हम सम्भल जाएगे ..............................
दूरियों से तो यूँ हम बिखर जाएगे |
पास आओ जरा हम सम्भल जाएगे ||
तेरी आँखों का अन्जन मैं ही बनूँ |
कुछ पल के लिये तो ठहर जाएगे||
आँसुओं में तेरे हम नजर आएगे |
हर दरद में तेरे हम छलक जाएगे ||
यादों में तेरी हम रचेंगे एक गजल |
गीत में ही सही गुनगना दे गजल||
गीत की इस लहर में हम मचल जाएगे |
पास आओ जरा हम सम्भल जाएगे ||
शबनमीं होठ को हम तरस जाएगे,
प्यास में तेरी हम बरस जाएगे ||
तेज धड़कन में यूँ हम फिसल जाएगे ,
साथ दे दो जरा हम सम्भल जाएगे ||
कब तलक चलेगी ये घड़ी इम्तिहां की,
इन इम्तिहानों से यूँ हम बिखर जाएगे ||
हाशिए पर खड़ी इक जिन्दगी कह रही,
कुछ तो कह दो जरा हम बहल जाएगे ||
पास आओ जरा.......................................
पास आओ जरा हम सम्भल जाएगे ||
तेरी आँखों का अन्जन मैं ही बनूँ |
कुछ पल के लिये तो ठहर जाएगे||
आँसुओं में तेरे हम नजर आएगे |
हर दरद में तेरे हम छलक जाएगे ||
यादों में तेरी हम रचेंगे एक गजल |
गीत में ही सही गुनगना दे गजल||
गीत की इस लहर में हम मचल जाएगे |
पास आओ जरा हम सम्भल जाएगे ||
शबनमीं होठ को हम तरस जाएगे,
प्यास में तेरी हम बरस जाएगे ||
तेज धड़कन में यूँ हम फिसल जाएगे ,
साथ दे दो जरा हम सम्भल जाएगे ||
कब तलक चलेगी ये घड़ी इम्तिहां की,
इन इम्तिहानों से यूँ हम बिखर जाएगे ||
हाशिए पर खड़ी इक जिन्दगी कह रही,
कुछ तो कह दो जरा हम बहल जाएगे ||
पास आओ जरा.......................................
Wednesday, February 20, 2013
बात बात में उनका इठलाना अच्छा...............................................
बात बात में उनका इठलाना अच्छा लगता है |
दस बहाने कर उनको झुठलाना अच्छा लगता है ||
भोली सूरत में बच्चों- सा शर्माना अच्छा लगता है |
बिन कारण ही उनसे गोठियाना अच्छा लगता है||
दर्शक दीर्घा में देख उन्हें मेरी पुतली सन्ग ,
मन ही मन उनका हर्षाना अच्छा लगता है||
निदिया रानी रात सुहानी में,
स्वप्निल पल में खो जाना अच्छा लगता है ||
सखी सहेली संग सुन्दर शैली और सहज सुरों में,
लब पर प्रीत सुमन खिल जाना अच्छा लगता है ||
साये शजर में , सखियों की नजर में ,
कल्पित किस्सों में रम जाना अच्छा लगता है |
मेरे उर आखर अक्षर और शब्द पहेली पर ,
उनका यूँ चिढ़ जाना अच्छा लगता है ||
पल दो पल का उनका ये याराना अच्छा लगता है |
खुदगर्ज़ हूँ कि कुछ को मेरा शायराना अच्छा लगता है ||
बात बात में..........................................................
दस बहाने कर उनको झुठलाना अच्छा लगता है ||
भोली सूरत में बच्चों- सा शर्माना अच्छा लगता है |
बिन कारण ही उनसे गोठियाना अच्छा लगता है||
दर्शक दीर्घा में देख उन्हें मेरी पुतली सन्ग ,
मन ही मन उनका हर्षाना अच्छा लगता है||
निदिया रानी रात सुहानी में,
स्वप्निल पल में खो जाना अच्छा लगता है ||
सखी सहेली संग सुन्दर शैली और सहज सुरों में,
लब पर प्रीत सुमन खिल जाना अच्छा लगता है ||
साये शजर में , सखियों की नजर में ,
कल्पित किस्सों में रम जाना अच्छा लगता है |
मेरे उर आखर अक्षर और शब्द पहेली पर ,
उनका यूँ चिढ़ जाना अच्छा लगता है ||
पल दो पल का उनका ये याराना अच्छा लगता है |
खुदगर्ज़ हूँ कि कुछ को मेरा शायराना अच्छा लगता है ||
बात बात में..........................................................
Friday, February 15, 2013
चाहतों पर मेरी वो सवाल कर गई.........................
पंखुड़ी गुलाब की वो दरकिनार कर गई |
हार की लड़ी में हमें भी बेशुमार कर गई ||
गिला ये नहीं कि वो इंकार कर गई |
चाहतों पर मेरी वो सवाल कर गई ||
गुजरती रही दिल की गलियों में गोरी ,
गम की लोरी में गुमाकर,मुझे गालिब करार कर गई ||
सालों से सहेजे स्वप्न को हलाल कर गई |
मेरे सपनों को तो होली का गुलाल कर गई ||
अपनी चाहत से चाहत का शिकार कर गई |
हार की कड़ी में हमे भी बेशुमार कर गई ||
हार की लड़ी में हमें भी बेशुमार कर गई ||
गिला ये नहीं कि वो इंकार कर गई |
चाहतों पर मेरी वो सवाल कर गई ||
गुजरती रही दिल की गलियों में गोरी ,
गम की लोरी में गुमाकर,मुझे गालिब करार कर गई ||
सालों से सहेजे स्वप्न को हलाल कर गई |
मेरे सपनों को तो होली का गुलाल कर गई ||
अपनी चाहत से चाहत का शिकार कर गई |
हार की कड़ी में हमे भी बेशुमार कर गई ||
Friday, February 8, 2013
तुम्हारी.....................
तुम्हारी शरबती आँखों में ,
डूबे हम ही ऐसे है ......
कयामत आँसुओं की है,
गीले हम ही ऐसे है.....
डूबना खासियत मेरी ,
डुबाने का इल्म तो तेरा है...
खता तो हम से होती है ,
वही तो जुल्म मेरा है.......................
तुम्हारी...........................
डूबे हम ही ऐसे है ......
कयामत आँसुओं की है,
गीले हम ही ऐसे है.....
डूबना खासियत मेरी ,
डुबाने का इल्म तो तेरा है...
खता तो हम से होती है ,
वही तो जुल्म मेरा है.......................
तुम्हारी...........................
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