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kaavya manjari

Thursday, May 22, 2014

माँ................................


दिन के ढलते ही माँ की इक फरियाद होती है|
जल्दी घर  आ जा तूँ  तेरी अब याद होती है||

खाने की ताजगी की भी कुछ मियाद होती है|
तेरे बिन छप्पन भोग की हर चीज बेस्वाद होती है||

देखो गाँव से बाबा  न जाने कब से  आए हैं|
माटी में लिपटी अठखेलियों की ही याद होती है||

धीर के रुखसार पे अब बेचैनियों का डेरा है|
मुन्तजिर आँखों में मिलन की मुराद होती है||

दिन के ढलते ही माँ की इक फरियाद होती है|
स्वप्निल इमारत की कुछ तो बुनियाद होती है||

दिन के ढलते ही......................

 मुन्तजिर - इन्तजार

13 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (23.05.2014) को "धरती की गुहार अम्बर से " (चर्चा अंक-1621)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. सुन्दर रचना |

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  3. जब दूर चले जाते हैं
    तो सब कुछ ठीक हो---की आस होती है.

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन डबल ट्रबल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. क्या खूब अशआर कहे हैं सर... सादर बधाई ।

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  6. वाह बहुत सुन्दर
    मन को छूती हुई
    संवेदनाओं को व्यक्त करती कविता---
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई ----

    आग्रह है---
    नीम कड़वी ही भली-----

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  7. उम्दा ग़ज़ल...

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